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सफाईकर्मी / एस. मनोज

रहता हूं आपके शहर में
आपके मकान से थोड़ा पीछे
बदबदाते मोहल्ले में
खदबदाते लोगों के साथ
शहर के बीचों-बीच।
किंतु मेरे लिए
शहर क्या ?
गांव क्या ?
सब समान है।
आज तक भी
मेरे लिए उपलब्ध नहीं है
एक अदद चापाकल
बच्चों के लिए शिक्षा
डाक्टर या अस्पताल
रोटी कपड़ा मकान
या अन्य जीवन रक्षक सुविधाएं।
इक्कीसवीं सदी में
इस छली लोकतंत्र में
यह सब मेरे लिए
स्वप्न क्या दिवास्वप्न हैं
और काम ?
बच्चे,बूढ़े,औरत,मर्द
सबके लिए उपलब्ध है।
कचड़े चुनना
सड़कों नालों की सफाई करना
और अपनी जिंदगी को
कूड़े के ढेर से आगे
ना बढ़ा पाना।
सब को स्वस्थ रखना
और अपना स्वास्थ्य बिगाडना।
इस उत्तर आधुनिक काल में
आदिम सभ्यता का प्रतिनिधि हूं
कोई खास नहीं पहचान है
सफाईकर्मी नाम है।