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सभ ठाँ छै काँट / मार्कण्डेय प्रवासी

 
सभ ठाँ छै काँट,
खजुरबन्ना छै सभ ठाँ,
तैयो हौ चान, कतहु बिलम’ आ बैस’ !
फाँक बहुत रास छै-
दूर डल्ली केर बीच,
सुटिया ले’ देह आ झोझरि धरि पैस’ !
काँटक शय्याक भीष्म-योग
भोगसँ कम नहि,
धवल किरण-गंगो केर-
कुशल-क्षेम छनि बहनहि
उत्तर व दक्षिण-
गोलार्द्धक हो चान मुदा,
सत्ता केर बोध होइछ-
ज्योति-कथा कहनाहि।
सभ ठाँ छै व्यथा,
आ संघर्षों सभ ठाँ,
तैयो अनुराग-मेघ उमड़ि-घुमड़ि बरिस’ !
गीतक अस्तित्व बिना-
सूखए नहि कण्ठ-देश,
तार-तार अपन प्राण-वीणा केर ऐंठ !