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"समय बड़ा बलवान / सपना मांगलिक" के अवतरणों में अंतर

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क्यों रहते हैं अनजान
 
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समय बड़ा बलबान रे भैया
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ऐसा जतन  करो
 
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सत्य धर्म की उड़े पताका कटुता दूर करो
 
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महक उठे जननी का आँचल ऐसे रंग भरो
 
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समय बड़ा बलवान
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देता रुतवे का साज - सामान
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खुद ही खुद की पहचान
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दे पटखनी मिलाये मिटटी में
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समय बड़ा बलवान रे भैया
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समय बड़ा बलवान
 
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12:41, 3 मई 2017 के समय का अवतरण

चलता ही रहता यह निरंतर
बिना किसी व्यवधान
जानकर भी इससे हम
क्यों रहते हैं अनजान
समय बड़ा बलवान रे भैया
ऐसा जतन करो
दिक् दिगंत तक कीर्ति –गंध से सुरभित पवन करो
महक उठे जननी का आँचल ऐसे रंग भरो
झिलमिल-झिलमिल उड़े गगन में माँ का आँचल धानी
लिखो समय के वक्षस्थल पर ऐसी अमिट कहानी
धरती की छाती पर रंग केसरिया शोर्य का लहराए
ऐसी हो हरित क्रांति जो श्रम के गीत सुनाये
चलता रहे चक्र उन्नति का ऐसे जतन करो
महक उठे जननी का आँचल ऐसे रंग भरो
रंग स्वेत, स्वेत क्रांति का बहे दूध की धारा
स्वेत चंद्रमा सा चरित्र हो, दमके जीवन सारा
मिटे कालिमा मानव मन से, स्निग्ध स्नेह इसमें भर दो
मरुस्थल से सूने जीवन को, नीर प्रेम से तर दो
नील गगन में श्याम मेघ बन, झर -झर नित झरो
महक उठे जननी का आँचल ऐसे रंग भरो
देश धर्म् हित शोर्य दिखावे, प्रतिदिन वर्दी खाकी
मिटे आंतरिक दवेष भावना, रहे ना कटुता बाकी
जन-जन के मस्तक पर दमके, देश प्रेम की लाली
गंगा यमुना सरयू गाये, गाथा गौरवशाली
सुरभित करने को जग कानन बन गुलाब बिखरो
महक उठे जननी का आंचल ऐसे रंग भरो
ओ मानस के चतुर चितेरे ऐसे चित्र बनादे
कभी ना छूटे दाग प्रीत का, ऐसा रंग लगादे
मस्तक पर गौरव का कुमकुम, हाथों मेहंदी श्रम की
देश प्रेम में हो सरोबार, टूटे चूड़ियाँ भ्रम की
सत्य धर्म की उड़े पताका कटुता दूर करो
महक उठे जननी का आँचल ऐसे रंग भरो
समय बड़ा बलवान
कभी नवाजे बल से धन से
देता रुतवे का साज - सामान
धन में रम के भूले जब मानुष
खुद ही खुद की पहचान
दे पटखनी मिलाये मिटटी में
कर देता है यह हलकान
समय बड़ा बलवान रे भैया
समय बड़ा बलवान
समय से कोई बच ना पाया
पीछे भागे हरपल इसका साया
हो जाए कब कुछ का कुछ
पहेली अजब कोई बूझ ना पाया
कभी उदित कभी अस्त
भाग्य विधाता समय तटस्थ
परिवर्तन का पाठ पढाए ये “सपना”
रखे ना किसी संग जान - पहचान
समय बड़ा बलवान रे भैया
समय बड़ा बलवान