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सर्जक जीवन / देसाकू इकेदा
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कला , हे अमर -ज्योति
अविनाशी छाप, सभ्यता की !
गीत जीवन का,मुक्ति का,सृजन का, आनंद का !
उत्कट प्रार्थना,गहन सामंजस्य आधारभूत सत्य से ,
गोष्ठी मित्रों की,जहाँ लाखों प्राणी
मिलते हैं ,अभिनन्दन -अभिवादन करते हैं परस्पर !
किसी विद्वान ने कहा था पश्चिम के -
पूर्व है पूर्व और पश्चिम -पश्चिम .
किन्तु मिले जब दो महानायक
सीमायें -राष्ट्रीयताएँ हो जायेंगी विलुप्त !
तभी पूर्व के एक महाकवि ने लिखा -
पूर्व और पश्चिम का हो परिणय
वेदी पर मानवता की !
और ये है कला
आमंत्रण करती आत्मा का पसारे भुजा
शांत व सौम्य उपवन की ओर
जहाँ कल्पना उड़ती है पंख पस्सारे, आकाश में !
आमंत्रण करती ज्ञान के भव्य मंच की ओर
लेजाती आत्मा को दूरस्थ क्षितिज की ओर
सार्वभौमिक सभ्यता के !
अनुवादक: मंजुला सक्सेना