भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

साँचा:KKPoemOfTheWeek

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रँग गुलाल के

रँग गुलाल के
और फाग के बोल सुहाने
बुनें इन्हीं से संवत्सर के ताने-बाने

ऋतु-प्रसंग यह मंगलमय हो
हर प्रकार से
दूर रहें दुख-दर्द-दलिद्दर
सदा द्वार से

कभी किसी को
कष्ट न दें जाने-अनजाने

अग्नि-पर्व यह
रंगपर्व यह सच्चा होवे
पाप-ताप सब
मन के-साँसों के यह धोवे

हमें न व्यापें
कभी स्वार्थ के कोई बहाने

यह मौसम है
राग-द्वेष के परे नेह का
हाँ, विदेह होने का
है यह पर्व देह का

साँस हमारी
इस असली सुख को पहचाने