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सारा दिन / देवेन्द्र कुमार

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सारा दिन पक्षी-सा भटके
शाम हुई डालों से अटके ।

अन्धकार ने कि जुगाली
सूरज ने ये धूप उठा ली
लगा कि ये तारों के लटके ।

ये बादल
बन ये तन्हाई
पुरवा-पछवा की
महँगाई
दोस्त ये दुभाषिए निकट के ।

आँखों में
बाहों में
भर लें
मौसम को
मनोनीत कर लें
चाँद कभी आए तो
छँट के ।