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सुबह की गोरी /जावेद अख़्तर

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रात की काली चादर ओढ़े
मुंह को लपेटे
सोई है कब से
रूठ के सब से
सुबह की गोरी
आँख न खोले
मुंह से न बोले
जब से किसी ने
कर ली है है सूरज की चोरी

आओ
चल के सुरज ढूंढे
और न मिले तो
किरण किरण फिर जमा करे हम
और इक सूरज नया बनायें
सोई है कब से
रूठ के सब से
सुबह की गोरी
उसे जगाएं
उसे मनाएं