भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सुबह सवेरे / मनविंदर भिम्बर

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 04:56, 29 दिसम्बर 2010 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मनविंदर भिम्बर |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} <poem> सुबह सवेरे को…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सुबह सवेरे
कोहरे में सब कुछ
धुँधला गया

गुलाब का बूटा
जिससे महकता था आँगन
दरख़्त जहाँ पलती थी गर्माहट
मोड़ जहाँ इंतज़ार का डेरा था
कुछ भी तो नहीं दिख रहा
सब धुँधला गया

दिल पर हाथ रखा तो
वह धड़क गया
तेरे ख़याल भर से
सोचा
यह ख़याल है या ज़िक्र भर तेरा

तुम कहते हो
मैं कहीं गया नहीं, यही हूँ तेरे पास