Last modified on 19 जून 2009, at 22:34

सृजन / कविता वाचक्नवी

सृजन


अमरूद की भूरी शाख पर
चमकते सफ़ेद फूल,
आम्रकुंज के लदी डालियाँ,
बादाम के पेड़ पर
रंग बदलते, विशाल पत्ते,
झूलते अशोक वृक्ष,
इतराया - सा कैक्टस,
सब छोड़
तितली के पंखों पर
गीत लिखा करती हूँ...।

हर गीत
लिख छोडा़ है
उन रंगीन परों पर
जो झड़ जाएँगे एक दिन
सूख कर भुरभुराते
और मिल जाएगा
हर गीत
मिट्टी में,
विलीन हो जाएगा
तारों, नक्षत्रों और राशियों के प्रांगण में

तितलियाँ फिर भी आएँगी
और
सारे भुरभुराए गीत भूलकर
फिर रचूँगी
एक और - नया गीत
गीत पर गीत
हो जाएगा, फिर-फिर जो
अदृश्य
तितलियों के उड़ने में
पंखों के गिरने में
बार बार.....
और और.....।