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सोचने की बात / नवारुण भट्टाचार्य / मीता दास

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एक रोटी के भीतर
कितनी भूख होती है
एक जेल कितनी इच्छाओं को
रोक सकती है
अस्पताल के एक बिस्तर पर
कितने कष्ट अकेले सोए रह सकते हैं
एक वर्षा की बूँद के भीतर
कितने समन्दर होते हैं

एक पाखी के मर जाने पर
कितना आकाश रहता है शेष
एक लड़की अपने होंठों पर कितने
चुम्बन छुपा सकती है
एक आँख में मोतिया उतरने पर
कितने उजाले बुझ सकते हैं

एक लड़की मुझे कितने दिन
अनछुआ रख सकती है
एक कविता लिख कर कितना
हो हल्ला मचाया जा सकता है |

मूल बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद : मीता दास