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सोना तपता आग में / त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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सोना तपता आग में, और निखरता रूप।
कभी न रुकते साहसी, छाया हो या धूप॥
छाया हो या धूप, बहुत सी बाधा आयें।
कभी न बनें अधीर, नहीं मन में घवरायें।
'ठकुरेला' कविराय, दुखों से कैसा रोना।
निखरे सहकर कष्ट, आदमी हो या सोना॥