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स्मृतियाँ / लता अग्रवाल

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दिल के द्वार पर
दे दस्तक
गाहे-बगाहे चली आती हैं
स्मृतियाँ
सच, अतिथि होती है स्मृतियाँ
सुबह की चाय में
शक्कर-सी घुल जाती तो
कभी शाम की तन्हाइयों को
जवां कर आँखें नम करतीं

बिना पूर्व सूचना दिए
बिन आमंत्रण मिले
आ धमकती हैं
अतिथि की तरह
चाहे जब बिन आहट के
सच, मनमौजी होती हैं स्मृतियाँ

कभी स्मृतियों के धागे से
बुनकर जीवन में
तैयार करती हूँ आशाओं की चादर
स्मृति की अल्पना में हो रसभोर
मंद-मंद स्मित होठों पर
बरबस आ तैरते हैं मधुर गीत।

मन की बाम्बी में
स्मृतियों की चींटी जैसे काटने लगती है
खोए स्वप्न का कछुआ बार-बार
गर्दन बाहर निकालने को होता आतुर
मन का कोमल पौधा
न चाहते हुए विचारों की आँधी में
इधर-उधर हिलने लगता है
कुछ स्वप्न विस्मृति की गोद से
उछलकर समा जाते हैं गोद में मेरी।
ओर मैं खेलने लग जाती हूँ
न चाहते हुए उन स्मृतियों संग।