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हज़ार टूटे हुए ज़ावियों में बैठी हूँ / सरवत ज़ोहरा

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हज़ार टूटे हुए ज़ावियों में बैठी हूँ
ख़याल ओ ख़्वाब की परछाइयों में बैठी हूँ

तुम्हारी आस की चादर से मुँह छुपाए हुए
पुकारती हुई रूसवाईयों में बैठी हूँ

हर एक सम्त सदाएँ हैं चुप चटख़ने की
ख़ला में चीख़ती तन्हाइयों में बैठी हूँ

निगाह ओ दिल में उगी धूप को बुझाती हुई
तुम्हारे हिज्र की रानाइयों में बैठी हूँ

जुनून-ए-वस्ल तमाशे दिखा गया इतने
मैं आप अपने तमाशाइयों में बैठी हूँ