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"हम तुझ से किस हवस की फ़लक जुस्तजू करें / ख़्वाजा मीर दर्द" के अवतरणों में अंतर

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न गुल को है सबात न हम को ऐतबार,<br>
 
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19:10, 29 दिसम्बर 2008 के समय का अवतरण

हम तुझ से किस हवस की फ़लक जुस्तजू करें|
दिल ही नहीं रहा है जो कुछ आरजू करें|

मिट जायें एक आन में कसरत नमयाँ,
हम आईने के सामने आ कर जो हू करें|

तार-दामनी पे शेख़ हमारी न जाई ओ,
दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वजू करें|

सर ता क़दम ज़बां है जूं शमा गो कि हम,
पर ये कहाँ मजाल जो कुछ गुफ्तगू करें|

हर चन्द आईना हूँ पर इतना न क़बूल,
मुँह फेर ले वो जिसके मुझे रू-ब-रू करें|

न गुल को है सबात न हम को ऐतबार,
किस बात पर चमन हवस-ए-रंग- ओ-बू करें|

है अपनी ये सलाह कि सब ज़ाहिदान-ए-शहर,
ऐ ‘दर्द’ आ के बेत-ए-दस्त-ए-सबू करें|