भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हम ही थे बकलोल / राकेश रंजन

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:28, 23 मई 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राकेश रंजन |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKav...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुम्हरे अद्भुत बोल।

सब थे झूठे, सब थे झाँसे, सब थे खाली झोल।।
सब ऊपर से दिव्य बकैती, सब भीतर से पोल।
हम ही समझ नहीं पाए थे, हम ही थे बकलोल।।

कहा कि हमरे नंगे तन को दोगे वस्त्र अमोल।
नहीं पता था हमरी फटी लँगोटी दोगे खोल।।
हेन करेंगे, तेन करेंगे, दुर्दिन होगा गोल।

अच्छे दिन आएँगे, ढमढम खूब बजाया ढोल।।
नहीं पता था कर दोगे तुम भारत को भंडोल।
अब तुम हमरा भाग्य हसोथो हम चोंथेंगे ओल।।