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हर्फ़ / एजाज़ फारूक़ी

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वादी वादी सहरा सहरा फिरता रहा मैं दीवाना
कोह मिला
तो दरिया बन कर उस का सीना चीर के गुज़रा
सहराओं की तुंद-हवाओं में लाल बन कर जलता रहा
धरती की आग़ोश मिली
तो पौदा बन कर फूटा
जब आकाश से नज़रें मिलीं
तो ताएर बन के उड़ा
गारों के अँधियारों में मैं चाँद बना
फिर भी मैं दीवाना रहा
अपने सपनों ख़्वाबों की उल्टी सीधी तस्वीर बनाई
टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचीं
लेकिन जब इक हर्फ़ मिला
गोया नूर की किरनें मेरे दो होंटों में सिमट आई हैं
मैं चराग़-ए-अल्ला-दीं ले कर
ग़ारों के अँधियारों में खोए हुए मोती ढूँढ रहा हूँ