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हर की पौड़ी से (1) / संजय अलंग

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प्रवाह तीव्र उत्कण्ठ,
आतुर बिखेरने को सब कुछ
समेटा नहीं अपने में कुछ


किनारे तिलक लगाता पंडा
घाट पर बैठा पुजारी
अंजुली में बटोरने का करता प्रयास
आता हाथ अस्थियों से निकला सिक्का
साथ चुम्बक लगा बटोरता लड़का
सैनिक सा सचेत
समर्पण मुद्रा सा प्रवाह
निर्लिप्त गंगा, पर परित्यक्त नहीं