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हिन्दू हम बन जाएँगे / खगेंद्र ठाकुर

सूखा पड़ गया
फसल मारी गयी
बादल निकले बेवफा
मौसम है कसूरवार.
 
बाढ़ आ गयी
गाँव दह गए
लहलहाती फसल बह गयी
कोई क्या कर सकता था?
नदियाँ हो गयी थीं पागल.
 
खाने की चीजें हो गयीं भूमिगत
महंगाई चढ़ी आसमान
लोग दौड़ते हुए परेशान
बोले देश के मंत्री प्रधान
इसके लिए है जवाबदेह आसमान
 
हतप्रभ है सुन कर जनता
बाग-बाग हैं अपने लोग
अटल जी हैं एकदम लाजवाब
नेता हो तो ऐसा हो
क्या कहने हैं – अजी वाह
 
उधर मुस्का रहा है प्याज
गदगद है जमाखोर समाज
पता नहीं कहाँ गया नमक
लापता है चेहरे की चमक
जनता करने लगी आह
अजी अटल जी वाह-वाह
 
कोई बात नहीं प्रधान जी
गीत भारतीय संस्कृति के गाइए
मुनाफाखोरों को कष्ट नहीं दीजिए
हम भी करते हैं प्रतिज्ञा
हिन्दू हम बन जाएँगे
प्याज नहीं खाएँगे
एकादशी हर रोज करेंगे
नमक आपसे नहीं मांगेंगे.
 
अटल रहे आपका व्यापार
अटल हों करें गगन-विहार
करे न कहीं कोई भी आह
अजी अटल जी वाह-वाह.