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हुड़क उठी / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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105
हुड़क उठी
पिछले जनमों की
रोके न रुकी।
106
बिछड़े तुम
कटी पतंग हम
किधर उड़ें?
107
प्राण -पथिक
चलकर ये हारे
मंज़िल खोई।
108
सूली टँगे थे
हम जी न सके
मरके जिए।
109
साँसें अटकीं
रूह तक भटकी
मरु-विस्तार।
110
शिक़वा भी क्या
क़ातिल अपने हों
किसे दोष दें!
111
चैन न मिले
बद्दुआएँ जो बाँटें
दग्ध ही होंगे।