भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

है इसी में प्यार की आबरू / राजा मेंहदी अली खान

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:15, 15 सितम्बर 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राजा मेंहदी अली खान |अनुवादक= |संग...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

है इसी में प्यार की आबरू
वो जफ़ा करे, मैं वफ़ा करू
जो वफ़ा भी काम ना आ सके
तो वो ही कहे के मैं क्या करू

मुझे ग़म भी उन का अज़ीज है
के उन ही की दी हुई चीज़ है
यही गम है अब मेरी जिंदगी
इसे कैसे दिल से जुदा करू

जो ना बन सके मैं वो बात हूँ
जो ना ख़त्म हो मैं वो रात हूँ
ये लिखा है मेरे नसीब में
यूँ ही शम्मा बन के जला करू

न किसी के दिल की हूँ आरजू
न किसी नज़र की हूँ जुस्तजू
मैं वो फूल हूँ जो उदास हो
ना बहार आए तो क्या करू