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हॉब्स से एक संवाद / छवि निगम

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सुनो हॉब्स!
तुमने कहा था न
तुमने और डर ने एक संग जन्म लिया था...
हाँ ये सही है बिलकुल
मेरा भी ऐसा ही जुड़वां
साथ ही जन्मा था
पर हॉब्स वो डर नहीं था
वो थी जिद!
लेकर रहना जन्म
एक जिद थी
फिर जिद थी इस निर्बन्ध मन को जीना
तन में कैद हो न रहना, ये जिद थी
गूंजना था एक नाद सा
धूप से पैंया पैंया दौड़ लगाने की जिद थी।
कुछ इतर भी होना था
गिलहरी होना था मुझे
जलपरी
या गौरैया
तीनो ही जीवन जीने में रोक क्या थी कहो तो?
एक बूँद बरसना
सागर के हृदय सीप में मोती हो जाना था..
खुद ही उकेरनी थीं
रेखाओं को फिसलते देना था हथेलियों पर मुझे
भागूँ दौडूँ उड़ जाऊँ
तैरूं या कि डूब जाऊँ
अपनी मर्जी से खिलने बिखर जाने की जिद थी
मरने से पहले जी जाऊं थोड़ा बस ये जिद थी
तुम्हें तो उबार लिया लैवायथान ने,ओ हॉब्स
वो आधा मनुष्य पशु आधा
शायद डर को मार पाया हो तुम्हारे
पर मुझे जिलाती मेरे साथ मेरी ज़िद थी
सुनो हॉब्स
तुम न जान पाओगे
पर मेरे टूटने पर हर बार मेरी ज़िद भी बिखरी
और जान लो
 होकर कई गुना आज
असंख्य कोखों में धड़क रही जो
कभी बस मेरी जिद थी।

* थॉमस हॉब्स एक प्रख्यात आधुनिक राजनितिक विचारक थे, जिन्होंने लैवाय्थान नामक ग्रन्थ की रचना की।