भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

होली खेले लाड़ली मोहन से / बुन्देली

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 18:20, 20 मार्च 2016 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

होली खेले लाड़ली मोहन सें।
बाजत ताल मृदंग झांझ ढप
शहनाई बजे सुर तानन से। होली...
भर पिचकारी मोरे सन्मुख मारी
भीज गईं मैं तन मन से। होली...
उड़त गुलाल लाल भये बादल
रोरी भलें दोऊ गालन सें। होली...
फगुआ मिले बिन जाने न दूंगी
कह दो यशोदा अपने लालन सें।
होली खेले लाड़ली मोहन सें।