भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

स्त्री – तीन / राकेश रेणु

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:20, 28 अप्रैल 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राकेश रेणु |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKa...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वे जो महुए के फूल बीन रही थीं
फूल हरसिंगार के
प्रेम में निमग्न थीं ।

वे जो गोबर पाथ रही थीं
वे जो रोटी सेंक रही थीं
वे जो बिटियों को स्कूल भेज रही थीं
सब प्रेम में निमग्न थीं ।

वे जो चुने हुए फूल एक-एक कर
पिरो रही थीं माला में
अर्पित कर रही थीं
उन्हें अपने आराध्य को
प्रेम में निमग्न थीं ।

स्त्रियाँ जो थीं, जहाँ थीं
प्रेम में निमग्न थीं ।

उन्होंने जो किया —
जब भी जैसे भी
प्रेम में निमग्न रहकर किया
स्त्रियों से बचा रहा प्रेम पृथ्वी पर ।

प्रेममय जो है
स्त्रियों ने रचा ।