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मेरी मज़लूमियत पर ख़ून पत्थर से निकलता है / मुनव्वर राना

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मेरी मज़लूमियत पर ख़ून पत्थर से निकलता है
मगर दुनिया समझती है मेरे सर से निकलता है

ये सच है चारपाई साँप से महफ़ूज़[1]रखती है
मगर जब वक़्त आ जाए तो छप्पर से निकलता है

हमें बच्चों का मुस्तक़बिल[2]लिए फिरता है सड़कों पर
नहीं तो गर्मियों में कब कोई घर से निकलता है

शब्दार्थ
  1. सुरक्षित
  2. भविष्य