भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

आजकल जब कि मेरे पास है फ़ुरसत जानां / अनीस अंसारी

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:29, 10 अगस्त 2013 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अनीस अंसारी }} {{KKCatGhazal}} <poem> आजकल जब कि ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आजकल जब कि मेरे पास है फ़ुरसत जानां
दूर मसरूफ़ हो, कैसे हो मुहब्बत जानां

रात तो नींद के पहलू में गुज़र जाती है
दिन में तन्हाई के संग रहती है साहेबत जानां

आज कुछ बात है जो दर्द सिवा होता है
दस्त-ए-नौमीदी ने क्यों की है जराहत जानां

कासा-ए-चश्म पे शायद कोई रूक्क़ा आये
दर-ए-सरकार कभी बटती है नेअमत जानां

बेगुनाही की सज़ा है तो गुनह बेहतर था
लज़्ज़त-ए-दहर से कुछ मिलती हलावत जानां

हैं शहीदों पे अज़ादारी की रस्में मतरूक
अब यज़ीदों पे नहीं होती मलामत जानां