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औरत / रजनी अनुरागी

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औरत

घर में
हर कहीं बिखरी होती है औरत
लेकिन उसका कोई घर नहीं होता
वह घर होती है दूसरों के लिए
दूसरे रहते हैं उसमें
मगर वह खुद में नहीं रहती
 
सबको संभालती है
पोसती है पालती है
सबके लिए वक्त निकालती है
पर अपने लिए नहीं होता
उसके पास वक्त
  
टंगी रहती है औरत पर्दे की तरह
आड़ देती हुई घर की तमाम कमजोरियों को
पर सड़क पर ला दिया जाता है
उसका सम्मान कभी भी

सीवन करती है वह तमाम उधड़नों की
और खुद ही उधड़-उधड़ जाती है
हाड़ तोड़ बेगार करती है तमाम उम्र
और तमाम उम्र खाली हाथ रहती है
महसूस करती है वह सबका दर्द
और उसका दर्द कोई महसूस नहीं करता

तरह-तरह की भूमिकाएं हैं
औरत के लिए
मगर औरत की अपनी कोई भूमिका नहीं

औरों की तरह
औरत भी अपना सफ़र करती है
मगर औरत की ज़िंदगी में
पिता के घर से पति के घर तक
और पति के घर से मृत्यु के घर तक
कोई हमसफर नहीं होता !