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111 से 120 तक / तुलसीदास / पृष्ठ 1

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पद संख्या 111 तथा 112

(111)

श्री केसव! क्हि न जाइ का कहिये।
देखत रव रचना बिचित्र हरि! समुझि मनहिं मन रहिये।1।

सून्य भीति पर चित्र , रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे।
धोये मिटइ न मरइ भीति, दुख पाइय एहि तनु हेरे।। 2।

रबिकर-नीर बसै अति दारून मकर रूप तेहि माहीं।
बदन -हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं।3।

 कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै ।
तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सेा आपन पहिचानै।4।

(112)
केसव कारन कौन गुसाईं।
जेहिं अपराध असाध जानि मोहिं तजेउ अग्यकी नाईं। 1।

परम पुनीत संत कोमल-चित, तिनहिं तुमहिं बनि आई।
तौं कत बिप्र ब्याध गनिकहि तारेहु, कछु रही सगाई?।2।

काल , करम, गति अगति जीवकी, सब हरि! हाथ तुम्हारे।
सोइ कछु करहु हरहु ममता प्रभु! फिरउँ न तुमहिं बिसारे।3।
 
जो तुम तजहु, भजौं न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे।
मन -बच-करम नरक-सुरपुर जहँ तहँ रघुबीर निहोरे।4।

जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सों करौं ढिठाई।
 तुलसिदास सीदत निसदिन देखत तुम्हारि निठुराई।5।