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119 / हीर / वारिस शाह

राजी हो पंजां पीरां हुकम कीता बच्चा मंग दुआ जो मंगनी है
अज हीर जटी मैंनू बखश उठो रंगन शोक दे नाल ओह रंगनी है
मैंनूं लाए बभूत मलंग[1] करना बचा ओह भी तेरी मलंगनी है
जेहे नाल लगीये तेहे हो रहीए नंग नाल बोली ओ भी नंगनी है
वारस शाह ना सोहे उधाल जटी, नही मापिआं दे घर लंबनी है

शब्दार्थ
  1. दरवेश, फकीर, मस्त