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127 / हीर / वारिस शाह

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हीर माउं नूं आण सलाम कीता माउं आखदी आ नी नहरिए नी
बड़बोलीए गोलिए बेहयाये खंडो टिडिए गुल बहरिए नी
तूं आयके साड़के लोहड़ दिता लिंग घडूंगी नाल मुतहरिए[1] नी
अक उठसी आखनी हां टल जा उधलो महर रांझे देनाल दिए महरिए नी
साहनां नाल रहें दिन रात खैंहदी आ टली कुपतीए रहड़िए नी
अज रात नूं जू वाह[2] डोबां तेरी सायत आवंदी कहरिए नी
वारस शाह जदों कपड़धड़ी होसी बेखीं नाल ढाहा उते लहरिए नी

शब्दार्थ
  1. सोटा
  2. नदी