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171 / हीर / वारिस शाह

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खेड़यां भेजया असां थे इक नाई करन मिंनतां चाए एहसान कीचै
भले जट बूहे उते आन बैठे एह छोकरी उन्हां नूं दान कीचै
रल्ल भाइयां एह सलाह दिती किहा असांदा सभ प्रवान कीचै
अन्न धन दा कुझ विसाह नाहीं अते बाहां दा ना गुमान कीचै
जिथे रब्ब दे नाम दा जिकर आवे लख बेटियां चा कुरबान कीचै
वारस शाह मियां नहीं करो आकड़ फरऔण<ref>प्राचीन मिस्त्री बादशाह</ref> जेहां वल ध्यान कीचै

शब्दार्थ
<references/>