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178 / हीर / वारिस शाह

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हीरे कहर कीतो रल नाल भाइयां सभा खुलक[1] तूं चा गवाइयां नी
जे तूं अंत एहो पिछा देवना सी एडिआं मेहनतां काहे कराइयां नी
एहा हद हीरे तेरे नाल साडी महल चाढ़ के पौड़ियां चाइयां नी
तैं तां वयाह दे हार शिंगार बधे अते खेड़यां घरीं वधाइयां नी
खाह कसम सौगंद तैं घोल पीती एह दसीं तूं पूरीयां पाइयां नी
बाहों पकड़ के टोर चा कढ देसों ओवें तोड़ नैनां जिवें लाइयां नी
यार यार थीं जुदा हुण दूर कीचै मेरे बाब तकदीर लिखाइयां नी
वारस शाह ठगिओ दगा दे के जेहियां कीतयां सो असां पाइयां नी

शब्दार्थ
  1. शिष्टाचार