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273 / हीर / वारिस शाह

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जोगी नाथ तों खुशी लै विदा होया छुटा ब्राजज्यों तेज तरारयां नूं
इक पलक विच कम हो गया उसदा लगी अग फेर चेलयां सारयां नूं
मुड़के रांझणे इक जवाब दिता उन्हां चेलयां हैंस्यारयां[1] नूं
भले कर्म होवण ताहींए जोग पाईढ मिले जोग न करमां दयां मारयां नूं
असीं जट अनजान थीं फस गए करम कीतो सू असां नकारयां नूं
वारस शाह अल्ला जदों करम[2] करदा हुकम हुंदा ए नेक सतारयां नूं

शब्दार्थ
  1. लोग
  2. रहमत