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अपदार्थ / कुबेरनाथ राय

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तो क्या हुआ यदि मैं जगत में रह गया अपदार्थ
राष्ट्र के, संसार के, परिवार के कुछ काम आया मैं नहीं।
हर्ज क्या यदि कुछ भी न पाया स्वार्थ या परमार्थ
कर्म का, संघर्ष का, जयगान का अभिमान कर पाया नहीं।

रेह ऊपर रेत में यदि कामना के बीज मेरे
अर्थ में बोये गये, रिक्त मुट्ठी रह गया मैं,
निरर्थक श्रम सींकरों में बह गई परिकल्पनायें
मृत हुई संभावना, किस्मत रही आँखें तरेरे।

फिर भी तुम्हारा परस मिलता जब कभी
प्रात के उल्लास में, सांझ के उच्छ्वास में
सरल शिशु के रुदन में, वृद्ध के विश्वास में
वृषभ के हुंकार में, पहचान पाता जब कभी
यह सब तुम्हीं हो, शेष सब है व्यर्थ
अपदार्थ,
तब न मैं रह जाता अकिंचन दीन या अपदार्थ।

[1962 ]