भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

आदर्श / निदा नवाज़

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:25, 12 फ़रवरी 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=निदा नवाज़ |अनुवादक= |संग्रह=अक्ष...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मेरे शहर में
आना हो तो
अपनी आँखें निकालकर
सिगरेट-बिट की तरह
पांव-तले मसल दो।
आदर्शों के सारे पन्ने
सूखी लकड़ी की तरह
जला दो।
क़लम की जीभ
किसी सिरफिरे के सिर की तरह
काट दो।
कि अब यहाँ
देखना,सोचना
और लिखना है पाप।