भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

दारुण अन्त / सविता सिंह

Kavita Kosh से
Linaniaj (चर्चा) द्वारा परिवर्तित 01:03, 28 दिसम्बर 2007 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सविता सिंह |संग्रह=नींद थी और रात थी / सविता सिंह }} नहीं ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

नहीं आती रोशनी वहाँ

जहाँ जीने लगता है अन्धकार

हम सब का जीवन


नहीं ठहरती क्षमा

पलट कर चल देती है निष्ठुरता की ओर

क्रूरता ही बन जाए जहाँ जीवन का पर्याय

नहीं होगी करुणा

लिए जा रहा है अदृश्य संस्कार हमें जहाँ

रुदन में मिश्रित पश्चाताप ही होगा

और दारुण अन्त उस सपने का

जो है हमारा देश