भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

प्रतिरोध अमर है / भरत प्रसाद

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 10:56, 14 सितम्बर 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=भरत प्रसाद |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKav...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब फुफकारती हुई मायावी सत्ता का आतंक
ज़हर के मानिन्द हमारी शिराओं में बहने लगे
जब झूठ की ताकत सच के नामोनिशान मिटाकर
हमारी आत्मा पर घटाटोप की तरह छा जाए
जब हमारी ज़ुबान फ़िज़ाओं में उड़ती दहशत की सनसनी से
गूंगी हो जाए
जब हमारा मस्तक सैकड़ों दिशाओं में मौज़ूद तानाशाही की माया से
झुकते ही चले जाने का रोगी हो जाए
तो प्रतिरोध अनिवार्य है
 
अनिवार्य है वह आग जिसे इन्कार कहते हैं
बेवशी वह ज़ंजीर है जो हमें मुर्दा बना देती है
विक्षिप्त कर देती है वह पराजय
जो दिन रात चमड़ी के नीचे धिक्कार बनकर टीसती है

गुलामी का अर्थ
अपने वजूद की गिरवी रखना भर नहीं है
न ही अपनी आत्मा को बेमौत मार डालना है
बल्कि उसका अर्थ
अपनी कल्पना को अन्धी बना देना भी है
अपने इन्सान होने का मान यदि रखना है
तो आँखें मूँद कर कभी भी पीछे-पीछे मत चलना
हाँ-हाँ की आदत अर्थहीन कर देती है हमें
जी- जी कहते कहते एक दिन नपुंसक हो जाते हैं हम
तनकर खड़ा न होने की कायरता
एक दिन हमें ज़मीन पर रेंगने वाला कीड़ा बना देती है

ज़रा देखो ! कहीं अवसरवादी घुटनों में घुन तो नहीं लग गए हैं
पंजों की हड्डियाँ कहीं खोखली तो नहीं हो गई हैं
हर वक़्त झुके रहने से
रीढ़ की हड्डी गलने तो नहीं लगी है
पसलियाँ चलते-फिरते ढाँचे में तब्दील तो नहीं होने लगी हैं

ज़रा सोचो !
दोनों आँखें कहीं अपनी जगह से पलायन तो नहीं करने लगी हैं
अपमान की चोट सहकर जीने का दर्द
पूछना उस आदमी से
जो अपराध तो क्या अन्याय तो क्या
सूई की नोंक के बराबर भी झूठ बोलते समय
जिसका रोवाँ-रोवाँ काँपता है

याद रखना
आज भी जालसाज की प्रभुसत्ता
सच्चाई के सीने पर चढ़कर उसकी गर्दन तोड़ते हुए
ख़ूनी विजय का नृत्य करती है
आज भी ऐय्याश षड्यन्त्र के गलियारे में
काटकर फेंक दी गई ईमानदारी की आत्मा
मरने से पहले सौ-सौ आँसू रोती है
अपनी भूख मिटाने के लिए
न्याय को बेच-बाचकर खा जाने वाले व्यापारी
फ़ैसले की कुर्सी पर पूजे जाते हैं आज भी

आज का आदमी
उन्नति के बरगद पर क्यों उल्टा नज़र आता है
आज दहकते हुए वर्तमान के सामने
उसका साहसिक सीना नहीं
सिकुड़ी हुई पीठ नज़र आती है
आज हम सबने अपनी-अपनी सुरक्षित बिल ढूँढ ली है
ज़माने की हक़ीक़त से भागकर छिपने के लिए

इससे पहले कि तुम्हारे जीवन में
चौबीस घण्टे की रात होने लगे
रोक दो मौज़ूदा समय का तानाशाह पहिया
मोड़ दो वह अन्धी राह
जो तुम्हें गुमनामी के पाग़लखाने के सिवाय
और कहीं नहीं ले जाती
  
फिज़ा में खींच दो न बन्धु !
इन्कार की लकीर
आज तनिक लहरा दो न !
ना कहने वाला मस्तक
बर्फ़ की तरह निर्जीव रहकर
सब कुछ चुपचाप सह जाने का वक़्त नहीं है यह