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बदल के भेस भी लौटल मौसम / राज रामदास

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बदल के भेस भी लौटल मौसम
बदल के बादल बरसे है
केके देखे के तरसे आँखि
केकर बोली बिन सूना मन

कभी खुसी रहली रहा सुख इतना
की सह सकती और कितना
आज बकी जौन बाकी रहगे
बहगे कौन जुदाई संघे

सहेलियाँ ना समझी ना समझिस समाज
अब खोली कहाँ अपने दिल की तजोरी
समझिस बकी ना जौन जान से प्यारा
फिर समझे कैसे पराया

कैसे कही अपनी कठिन कहानी
केके लेई भरोसे में
कहीं झुराई न जाइ, के जाने जवानी
पूजा के फूल जैसे

चाहत चिल्ला है छाती में ऐसे
हम बोली कैसे बोली कैसे
अनबोलल बात जो समझिम ना
उ प्रेम के भाषा समझे कैसे।