भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बिनती रायप्रबीन की / प्रवीणराय

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:49, 29 जुलाई 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=प्रवीणराय |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatChha...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बिनती रायप्रबीन की, सुनिये साह सुजान।
जूठी पतरी भखत हैं, बारी-बायस-स्वान॥

बादशाह अकबर के यहाँ जाने के पहले उसने महाराज से इस प्रकार निवेदन किया था:-

आई हौं बूझन मन्त्र तुम्हैं निज स्वासन सों सिगरी मति गोई.
देह तजौं कि तजौं कुल कानि हिये न खजौं लजिहैं सब कोई॥
स्वारथ ओ परमारथ को पथ चित्त बिचारि कहौ तुम सोई.
जामे रहै प्रभु की प्रभुता अरु मोर पतिब्रत भंग न होई॥

कहा जाता है कि अकबर बादशाह ने प्रवीणराय को दो दोहों के एक-एक चरण देकर उनकी पूर्ति करने के लिए उससे कहा और प्रवीणराय ने भी उनकी पूर्तियाँ प्रस्तुत करके बादशाह को प्रसन्न कर लिया। नीचे ये दोहे दिये जाते हैं; इनमें प्रथम चरण बादशाह के और द्वितीय चरण प्रवीणराय के हैं:-

 (1)

युवन चलत तिय देह ते, चटक चलत किहि हेत।
मनमथ बारि मसाल को, सौति सिहारो लेत॥

 (2)

ऊँचै हैं सुरबस किये नीचे नर बस कीन।
अब पताल बस करन को ढरकि पयानो कीन॥