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भ्रम-बिधोंसवा का अंग / कबीर

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जेती देखौं आत्मा, तेता सालिगराम ।
साधू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सूं काम ॥1॥

भावार्थ - जितनी ही आत्माओं को देखता हूँ, उतने ही शालिग्राम दीख रहे हैं । प्रत्यक्ष देव तो मेरे लिए सच्चा साधु है ।पाषाण की मूर्ति पूजने से क्या बनेगा मेरा ?

जप तप दीसैं थोथरा, तीरथ ब्रत बेसास ।
सूवै सैंबल सेविया, यौं जग चल्या निरास ॥2॥

भावार्थ - कोरा जप और तप मुझे थोथा ही दिखायी देता है, और इसी तरह तीर्थों और व्रतों पर विश्वास करना भी । सुवे ने भ्रम में पड़कर सेमर के फूल को देखा, पर उसमें रस न पाकर निराश हो गया वैसी ही गति इस मिथ्या-विश्वासी संसार की है ।

तीरथ तो सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ ।
`कबीर' मूल निकंदिया, कौंण हलाहल खाइ ॥3॥

भावार्थ - तीर्थ तो यह ऐसी अमरबेल है, जो जगत रूपी वृक्ष पर बुरी तरह छा गई है । कबीर ने इसकी जड़ ही काट दी है, यह देखकर कि कौन विष का पान करे !

मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि ।
दसवां द्वारा देहुरा, तामैं जोति पिछाणि ॥4॥

भावार्थ - मेरा मन ही मेरी मथुरा है, और दिल ही मेरी द्वारिका है, और यह काया मेरी काशी है । दसवाँ द्वार वह देवालय है, जहाँ आत्म-ज्योति को पहचाना जाता है । [ दसवें द्वार से तात्पर्य है, योग के अनुसार ब्रह्मरन्ध्र से ।]

`कबीर' दुनिया देहुरै, सीस नवांवण जाइ ।
हिरदा भीतर हरि बसै, तू ताही सौं ल्यौ लाइ ॥5॥

भावार्थ - कबीर कहते हैं --यह नादान दुनिया, भला देखो तो, मन्दिरों में माथा टेकने जाती है । यह नहीं जानती कि हरि का वास तो हृदय में है , तब वहीं पर क्यों न लौ लगायी जाय ?