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रंगु रुखं वक्त जो समुझाए वयो / एम. कमल

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रंगु रुखं वक्त जो समुझाए वयो।
चोरु चोरी करे धमकाए वयो॥

हू घणनि जो ई ख़ुदा थी पवन्दो।
जंहिं खां शैतानु भी शरमाए वयो॥

खोहे ॿीजल छॾी सुर जी अज़मत।
सिरु वठी साज़ खे शरमाए वयो॥

अॼु छो साराह कई हुन मुंहिंजी?!
हिक नईंअ सोच में उलझाए वयो॥

अर्ज़ ते मुंहिंजे हू चुप-चाप खिली।
माना जे झंग में भिटिकाए वयो॥

हू सॼो ॾोहु मूं मां ई कढी।
जख़म दिल जा उघी जरकाए वयो॥