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शुक्र मनाओ / शरद कोकास

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वैदिक ऋचाएँ सुनने के आरोप में
मेरे पूर्वजों के कानों में
उँड़ेला हुआ पिघला गर्म सीसा
जला रहा है मेरी धमनियाँ

उनकी मर्मान्तक चीख़ें
हर रात उड़ा देती हैं मेरी नींद
गर्म सलाखों से दागी गयी

उनकी आँखों से टपकता लहू
यक-ब-यक
टपक पड़ता है मेरी आँखों से

जूठी पत्तलों के लिए
कुत्तों से लड़ते हुए
उनके शरीर पर पड़ी खरोंचें
मेरे बदन पर हैं

जो कुछ भी सहा गया
विरासत में मिला है मुझे
तुम्हें भी मिला है विरासत में
वही सब कुछ

रुको
अट्हास से आसमान मत गुँजाओ
समीकरण बदल रहे हैं अब
गनीमत है उलट नहीं रहे
शुक्र मनाओ!