घड़ा / सौरभ
एक
नया घड़ा खाली है
बूद लिए हुये
काई धीरे-धीरे जम रही है
सफाई चाहिए।
दो
घड़ा मिट्टी
से बना है
मिलेगा मिट्टी में
उस में बूँद
आई है सागर से
सागर ही है
सागर होना ही है इक दिन
सागर समाना बूँद में।
तीन
पहले बूँद
फिर घड़ा फिर से बूँद
फिर घड़ा
पिछला घड़ा साफ नहीं हो पाया।
चार
घड़ा खाली है
राम धुन बज रही है
घड़ा भरा है
सँसार चल रहा है।
पाँच
घड़ा पड़ा है
हवा उस में आती है जाती है
कोई नहीं देख रहा
घड़ा हवा हो गया
फिर भी रिक्त नहीं रहा
भर गया गुरु हुआ
रिक्त भी रहा
भर भी गया अनन्त से
विशाल हुआ घड़ा वही
उतना ही रहा
प्राण एक हुये उससे जो चहुँ ओर है
इसलिये असीम हो गया
अब घड़ा लिये फिर रहा सँसार
यशोदा ने देखा
कष्ण के मुँह में ब्रह्मांड।
छः
घड़ा मिट्टी से घड़ा
पानी में पड़ा
फिर भी रहा घड़ा
मिट्टी न हुआ।