भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

चलेगा तो चूम लेगी राह तेरे भी क़दम / जयप्रकाश त्रिपाठी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मुश्किलें आसान होने का जतन कर ख़ुद-ब-ख़ुद।
टूट मत, उठ, हो सके तो दिखा बनकर ख़ुद-ब-ख़ुद।

अन्धेरों के लिए कोई रात ठहरी है कहाँ,
सुबह होगी, खिल उठेगी धूप छनकर ख़ुद-ब-ख़ुद।

चलेगा तो चूम लेगी राह तेरे भी क़दम
छोड़ कन्धे, भार अब अपना वहन कर ख़ुद-ब-ख़ुद।

पार जाना चाहता, जो थाम कर बैसाखियाँ,
वह भँवर में डूब जाता है उफ़न कर ख़ुद-ब-ख़ुद।

ठान लेगा, उठेगा तो आन्धियाँ छँट जाएँगी,
तब कहेंगे लोग, देखो, खड़ा तनकर ख़ुद-ब-ख़ुद।