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नफरतों की आँधियों ने / शीतल वाजपेयी

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नफ़रतों की आँधियों ने फिर चरागों को बुझाया,
और हमने बाग की कुछ तितलियों को मार डाला।
 
कौन है ये कौम जो इंसाँ स्वयं को कह रही है?
राख ये शमशान की उड़कर हवा में बह रही है
खौफ़ की ख़ामोश रातों ने अँधेरे को जगाया
कँपकपाती देह ने फिर सिसकियों को मार डाला।
 
पाँखुरी को नोच कर ताकत दिखाई जा रही है
और उसकी शौर्य-गाथा भी सुनाई जा रही है
पाप होगा उन दरिंदों को अगर हम छोड़ देंगे
दर्द भी देखा न जिसने हिचकियों को मार डाला।
 
आँसुओं का, वेदना का, चीख का मज़हब बताओ,
कुर्सियाँ संवेदना भी हैं समझतीं मत जताओ,
खेल खूनी ये दरिंदे खेलते कब तक रहेंगे
फिर किसी गुमराह ने कुछ बच्चियों को मार डाला।