Last modified on 19 अक्टूबर 2009, at 08:12

बरसै तरसै सरसै अरसै न् / घनानंद

Rajeevnhpc102 (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:12, 19 अक्टूबर 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=घनानंद }}<poem>बरसैं तरसैं सरसैं अरसैं न, कहूँ दरसैं…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

बरसैं तरसैं सरसैं अरसैं न, कहूँ दरसैं इहि छाक छईं।
निरखैं परखैं करखैं हरखैं उपजी अभिलाषनि लाख जईं।
घनआनँद ही उनए इनि मैं बहु भाँतिनि ये उन रंग रईं।
रसमूरति स्यामहिं देखत ही सजनी अँखियाँ रसरासि भईं॥