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अल जैदी का जूता / मुकुल सरल

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आज का सबसे नया छंद है
अल जैदी का जूता
जिस पर मेरा मन हिलोरें ले रहा है
इस छंद में कविता रचो
तो कोई बात बने

अँधेरे में बिजली-सी कौंध-सा
ज़ुल्म के खिलाफ़
हर उस ज़ालिम के मुँह पर पड़ा है
मुंतज्रर अल जैदी का जूता
जो ख़ुद को समझता है जार्ज बुश
अमेरिकी साम्राज्यवाद से भी बड़ा है
अल जैदी का जूता
इसकी गूँज वहाँ तक है
जहाँ तक नहीं जाती कोई सदा
कोई आँसू...कोई आह!....
दिल की आग-सा
फैल गया है चारों तरफ़

बुश तुम्हारे बमवर्षकों
क्रूज-मिसाइलों
टैंकों-मशीनगनों
तुम्हारी पूरी फ़ौज
और गलीज़ चालों से भी
ज्यादा मारक और घातक है
ये अल जैदी का जूता

कोई मुझसे कहे कि लिखूँ
ज़ालिम का इतिहास
तुम्हारा कार्यकाल
तो बस तुम्हारी तस्वीर के साथ
चस्पाँ कर दूँगा
अल जैदी का जूता
तुम्हारी उपलब्धियों के लिए
सिर्फ़ एक ही पंक्ति होगी काफ़ी
कि इराक में
तुम्हारे मुँह पर खींचकर मारा गया जूता
.....
जिसे तुम चालाकी से बचा गए
लेकिन जो तुमसे चिपक गया है इस तरह
कि तुम्हें काटता रहेगा उम्र भर
और तुम्हारे जैसों को भी.....

और हाँ
सावधान!
मैंने भी पहन लिया है
अल जैदी का जूता
सिर्फ पाँव में नहीं
हाथों में भी...