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क़त्ल / दिलीप शाक्य

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एक चाकू की दस्तक से
टूट कर बिखर गया
हिज़्र कि अन्धेरी रात में
वस्ल की चांदनी का रुपहला ख़्वाब

होटल की अलसाई रौशनी में
ख़ून के धब्बों से भर गई
मोनालिसा की पवित्र मुस्कान

किसी क्लियोपेट्रा के पोलडांस पर उत्तेजित
इस कविता की अन्धेरी रात के नायक को
और भी उन्माद से भर गया
वस्ल की चांदनी के क़त्ल का समाचार

जबकि एक अनन्त अवसाद में डूबता गया
चाकू का समूचा वज़ूद

कविता की अन्धेरी रात से निकलकर
चाकू की नोक पर आ बैठा था
वस्ल की चांदनी का रुपहला ख़्वाब
अपने विशाल पंख फैलाए