"सृष्टि जो हमने रची / अनुराधा सिंह" के अवतरणों में अंतर
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18:14, 16 नवम्बर 2017 के समय का अवतरण
धरती जो मिलकर गोल की हमने
उत्तरी दक्षिणी ध्रुव के बीच
उस पर अकेली कैसे बसूँ अब
कहाँ से ढूँढ़ लाये थे चकमक
जब सुलगाया हमने सूरज
एक कमरे में दिन जलाया एक में बुझाई रात
आज कल वही धूप मेरी चादर परदे आँखें
सुखाने के काम आ रही है
हवा से कहो अपने बाल
बाँध कर ही रखती हूँ इन दिनों
बस उतनी ही बहा करे
जितनी मेरे फेफड़ों में जगह है
जितनी निःश्वास लौटा पाती हूँ जंगल को
एक रात काले जादू से स्याह की तुमने
मैंने टाइटेनियम टू से रंगा चाँद
एक निरभ्र था
जिसे आर्कटिक रंग से ढँक दिया था
कि मुझे नीला पसंद है
अक्सर यह सोचती हूँ
एक प्रेम का भी निर्माण किया था हमने
वह कहाँ गया भला
क्या तुम्हें भी बुरा लगता है
हमारी साथ साथ बनायी सृष्टि में
यूँ अकेले अकेले रहना

