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बाँसुरी / नज़ीर अकबराबादी

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जब मुरलीधर ने मुरली को अपनी अधर धरी।
क्या-क्या प्रेम प्रीति भरी इसमें धुन भरी॥
लै उसमें राधे-राधे की हर दम भरी खरी।
लहराई धुन जो उसकी इधर और उधर ज़री॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥1॥

कितने तो उसकी सुनने से धुन हो गए धनी।
कितनों की सुध बिसर गई जिस दम बह धुन सुनी॥
कितनों के मन से कल गई और व्याकुली चुनी।
क्या नर से लेके नारियां, क्या कूढ़ क्या गुनी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥2॥

जिस आन कान्ह जी को ायह बंसी बजावनी।
जिस कान में वह आवनी वां सुध भुलावनी॥
हर मन की होके मोहनी और चित लुभावनी।
निकली जहां धुन, उसकी वह मीठी सुहावनी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥3॥

जिस दिन से अपनी बंशी वह श्रीकिशन ने सजी।
उस सांवरे बदन पे निपट आन कर फबी॥
नर ने भुलाया आपको, नारी ने सुध तजी।
उनकी उधर से आके वह बंसी जिधर बजी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥4॥

ग्वालों में नंदलाल बजाते वह जिस घड़ी।
गौऐं धुन उसकी सुनने को रह जातीं सब खड़ी॥
गलियों में जब बजाते तो वह उसकी धुन बड़ी।
ले ले के इतनी लहर जहां कान में पड़ी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥5॥

बंसी को मुरलीधर जी बजाते गए जिधर।
फैली धुन उसकी रोज़ हर एक दिल में कर असर॥
सुनते ही उसकी धुन की हलावत<ref>मिठास</ref> इधर उधर।
मुंह चंग और नै की धुनें दिल से भूल कर॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥6॥

बन में अगर बजाते तो वां थी यह उसकी चाह।
करती धुन उसकी पंछी बटोही के दिल में राह॥
बस्ती में जो बजाते तो क्या शाम क्या पगाह।
पड़ते ही धुन वह कान में बलिहारी होके वाह॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥7॥

कितने तो उसकी धुन के लिए रहते बेक़रार।
कितने लगाए कान उधर रखते बार-बार॥
कितने खड़े हो राह में कर रहते इन्तिज़ार।
आए जिधर बजाते हुए श्याम जी मुरार॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥8॥

मोहन की बांसुरी के मैं क्या क्या कहं जतन।
लय उसकी मन की मोहनी धुन उसकी चित हरन॥
उस बांसुरी का आन के जिस जा हुआ बजन।
क्या जल पवन ”नज़ीर“ पखेरू व क्या हिरन॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥9॥

शब्दार्थ
<references/>