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{{KKRachna
|रचनाकार=फ़िराक़ गोरखपुरी
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[[Category:ग़ज़ल]]{{KKCatGhazal}}<poem>जब नजर आप की हो गई है<BR>ज़िन्दगी, ज़िन्दगी हो गई है<BR><BR> बारहा बर-खिलाफ़-ए-हर-उम्मीद<BR>दोस्ती, दुश्मनी हो गई है<BR><BR> है वो तकमील पुरकारियों की<BR>जो मेरी सादगी हो गई है<BR><BR> तेरी हर पुरशिश-ओ-मेहरबानी<BR>अब मेरी बेकसी हो गई है<BR><BR> भूल बैठा है तू कह के जो बात<BR>वो मेरी ज़िन्दगी हो गई है<BR><BR> बज़्म में आंख उठाने की तक्सीर<BR>ऐ फ़िराक, आज भी हो गई है<BR><BR/poem>
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